Tuesday, January 14, 2020

चाटुकार - वाक्प्रवीण !

    चाटुकार।   -   वाक्प्रवीण

चाटुकार कहो या चमचा ,
मिनियन कहो या मस्केबाज ।
दीमक लगे पेड़ की नाईं,
ग्रसित इन से पूर्ण समाज ।।

       कर्मठता का ढोंग रचा कर,
       दान्त निपोरें  बारम्बार  ।
        श्वान सरीखे तलवे चाटें,
        और आड़ में करें शिकार ।।

स्वार्थ का मिष्ठान चाटकर,
कुटिल जीव गुर्राते हैं !
रीढ़हीन ,निर्लज्ज,  निष्करुण,
सर्पिल पथ अपनाते हैं।

      जब अहंकार से फूला स्वामी ,
       निज विवेक - चिन्तन से हीन ।
       ऐसे में उन की बन आती,
        जो चाटुकार ,  वाक्प्रवीण  ।।

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Sunday, January 5, 2020

कर्म के काँटे रुके न उगने

                कर्म के काँटे रुके न उगने

कभी कभी एकान्त क्षणों में ,
यादें अंगड़ाई लेती हैं ।
जिन गलियों से मैं गुजरा हूँ ,
मौन बुलावा वे देती हैं ।  १

        वह सपनों का नीड़ निराला,
         शायद अब आबाद नहीं है ।
         या पुष्पों-सी प्यारी बस्ती,
         पतझड़ के उस पार कहीं है । २

डेरा अपना रैनबसेरा,
सुबह हुई चल चुग्गा चुगने,
इसी क्रम में जीवन बीता,
कर्म के काँटे रुके न उगने ! ३

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