कर्म के काँटे रुके न उगने
कभी कभी एकान्त क्षणों में ,
यादें अंगड़ाई लेती हैं ।
जिन गलियों से मैं गुजरा हूँ ,
मौन बुलावा वे देती हैं । १
वह सपनों का नीड़ निराला,
शायद अब आबाद नहीं है ।
या पुष्पों-सी प्यारी बस्ती,
पतझड़ के उस पार कहीं है । २
डेरा अपना रैनबसेरा,
सुबह हुई चल चुग्गा चुगने,
इसी क्रम में जीवन बीता,
कर्म के काँटे रुके न उगने ! ३
Balbir4u.blogspot.com
कभी कभी एकान्त क्षणों में ,
यादें अंगड़ाई लेती हैं ।
जिन गलियों से मैं गुजरा हूँ ,
मौन बुलावा वे देती हैं । १
वह सपनों का नीड़ निराला,
शायद अब आबाद नहीं है ।
या पुष्पों-सी प्यारी बस्ती,
पतझड़ के उस पार कहीं है । २
डेरा अपना रैनबसेरा,
सुबह हुई चल चुग्गा चुगने,
इसी क्रम में जीवन बीता,
कर्म के काँटे रुके न उगने ! ३
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