Sunday, January 5, 2020

कर्म के काँटे रुके न उगने

                कर्म के काँटे रुके न उगने

कभी कभी एकान्त क्षणों में ,
यादें अंगड़ाई लेती हैं ।
जिन गलियों से मैं गुजरा हूँ ,
मौन बुलावा वे देती हैं ।  १

        वह सपनों का नीड़ निराला,
         शायद अब आबाद नहीं है ।
         या पुष्पों-सी प्यारी बस्ती,
         पतझड़ के उस पार कहीं है । २

डेरा अपना रैनबसेरा,
सुबह हुई चल चुग्गा चुगने,
इसी क्रम में जीवन बीता,
कर्म के काँटे रुके न उगने ! ३

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