मैं - असहिष्णु आत्मकेन्द्रित,
उग्र, अकारण द्वेषपूर्ण ।
अविश्वासी, कटु- कुतर्की,
वाणी खरतर- व्यंगपूर्ण ।1
मैं – निन्दक, निष्ठाहीन–निष्करुण,
द्वेषाग्नि प्रचण्ड- चण्ड ।
अहंकारी-अविचारी-मनसुख -
अज्ञानी और गर्व-सण्ड ।2
मैं – अधिकार सजग, नित शंकालु,
अस्थिर मन, आकुल -अनुदार,
है अंतर ज्योति बुझी- -बुझी,
जागे कैसे तव अमर प्यार ।3
मैं – गणिताधारित- भावहीन,
स्वार्थपूर्ण- जीवन, नीरस ।
प्रभु! मानस के इस अन्धकूप में,
सत्य-ज्योति का हो उत्कर्ष ।4
30 दिसम्बर, 1999