Saturday, November 30, 2019

balbir: सरस्वती-वन्दना

balbir: सरस्वती-वन्दना:                      सरस्वती -वन्दना    श्वेत पद्म राजिता, देवी वीणा पाणिनी । शुचि शुभ्रा, ज्ञान-गंगा लोक-मंगल-कारिणी । श्वेताम्बर... उत्कर्ष   5


मैं असहिष्णु आत्मकेन्द्रित,

उग्रअकारण द्वेषपूर्ण ।

अविश्वासीकटुकुतर्की,

वाणी  खरतरव्यंगपूर्ण ।1


मैं – निन्दकनिष्ठाहीननिष्करुण,

द्वेषाग्नि प्रचण्डचण्ड ।

अहंकारी-अविचारी-मनसुख -

अज्ञानी और गर्व-सण्ड ।2


मैं – अधिकार सजगनित शंकालु,

अस्थिर मनआकुल -अनुदार,

है अंतर ज्योति बुझी- -बुझी,

जागे कैसे तव अमर प्यार ।3


मैं – गणिताधारितभावहीन,

स्वार्थपूर्णजीवननीरस ।

प्रभुमानस के इस अन्धकूप में,

सत्य-ज्योति का हो उत्कर्ष ।4

30 दिसम्बर, 1999

बलबीर

balbir: सरस्वती-वन्दना

balbir: सरस्वती-वन्दना:                      सरस्वती -वन्दना    श्वेत पद्म राजिता, देवी वीणा पाणिनी । शुचि शुभ्रा, ज्ञान-गंगा लोक-मंगल-कारिणी । श्वेताम्बर...

Thursday, November 28, 2019

balbir: अन्तर्मन

balbir: अन्तर्मन:   अंतर्मन    अंतर्मन , निर्बन्ध नींद में , कुरंग कुलांचें भरता है । अप्रशिक्षित मुक्त तुरंग - सा , वह सर्वत्र विचरता है । 1 ...

अन्तर्मन


  अंतर्मन
  
अंतर्मन, निर्बन्ध नींद में,
कुरंग कुलांचें भरता है ।
अप्रशिक्षित मुक्त तुरंग-सा ,
वह सर्वत्र विचरता है । 1

नित कल्पना कल्प-तरु की ,
फुंगी पर झूला करता है
पुलकित मन-पाखी गर्वीला,
फुग्गा-सा फूला करता है । 2

है अन्तर्मन के अतल गर्भ में,
आकुल, अकूत भाव-संसार
सपन-लोक में ही खुलते हैं,
अकथ, अजाने अंतर-द्वार। 3

सुसुप्ति के गहन तमस में
अद्भुत सपनों का सृजन ,
पर प्रलयकारी एक किरन ,
हा ! छुई-मुई-सा अंतर्मन ! 4
बलबीर


सरस्वती-वन्दना

                    सरस्वती -वन्दना  

 श्वेत पद्म राजिता, देवी वीणा पाणिनी ।
शुचि शुभ्रा, ज्ञान-गंगा लोक-मंगल-कारिणी ।
श्वेताम्बरधरा नित्या, श्वेतालंकार भूषिता ।
वन्दिता, सुस्मिता, देव-मानव – अर्चिता ।

श्वेत हंस वाहिनी,नीर-क्षीर विवेकनी,
सहज वरदायिनी, उच्च भाव-भाविनी ।
सर्व कला धारिणी ,सुस्मिता-शालिनी, 
नमस्तुभ्यम् ,विश्व-वन्द्या,मां, मनीषा-मानिनी !

 श्वेत पुष्प शोभिता, पूजिता सदा ।
ज्योतिर्मयी सरस्वती सत्य – विद्या ।
तमहर प्रकाशकर माँ! हमें सुपथ दिखा ।
जय जय माँ सरस्वती, जय जय जया ।
                            बलबीर


Thursday, November 21, 2019

मुक्तक

                      मुक्तक

        भिखारी हैं अनेकों जन, जो दर-दर भटकते हैं  ।
        खु़दी को दफन कर अपनी,बस फरियाद करते हैं ।।
सुखं जो भीख में मिलता , तो सारा जग सुखी होता ।
ज़िन्दगी जश्न बन जाती ,न कोई भी दुखी होता ।।

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        जब पूर्वाग्रह-अन्धभक्ति के,
हर तरफ नगाड़े बजते हैं ।
        धर्म और श्रद्धा की आड़ में,
पाखण्ड अखाड़े सजते हैं ।।

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आदि गुरू श्री नानक देव ने,
 जग को राह दिखाई है ।
 ‘इक नूर ते सब जग उपज्या’,
मानव सब भाई-भाई हैं ।।

  प्यार- मुहब्बत -भाईचारा ,
जग में सब से बड़ा सहारा ।
आपस में हम हों विश्वासी ,
यही सिखाते क़ाबा-काशी।।

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Friday, November 15, 2019

कैसे मुक्ति पाऊँ ॰

कैसे मुक्ति पाऊँ ॰

हँसना-रोना भूल चुका हूँ,
दिल की धड़कन किसे सुनाऊँ ।
विस्मृति के अंधकार में,
कहाँ स्वयं को खोजने जाऊँ ।

बेसुरी-सी एक ही धुन है ,
जिसकी निश-दिन अलख़ जगाऊँ ।
जग-दलदल में धंसा हुआ हूँ,
उससे कैसे मुक्ति पाऊँ !
००००००००००००००००००००००००००००

     कैसे जी पाऊँ ॰॰

बहुत क्रोधित हूँ अपने पर ,
जग-आकर्षण भूल न पाऊँ ।
जिस मिट्टी से निर्मित हूँ मैं,
उसे कहाँ अब धोने जाऊँ  !

जग-दलदल में कमल खिले हैं,
बीच इन्हीं के मैं मण्डराऊँ ।
जिस दलदल में पला-बढ़ा हूँ,
उसके बिन कैसे जी पाऊँ। !!



Monday, November 11, 2019

चाँद॰॰॰

               चाँद ॰
ऊबड़-खाबड़-निष्प्राण-पथरीला-वीरान,
इस सत्य से अवगत है आजकल इनसान  ।
हम यादों में बसे चाँद को भुलाएं कैसे ,
जमीं फ़र चाहत के उस चाँद लाएं कैसे !
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            बोतल ॰॰
कल तक थी खाली बोतल,
आज फिर से भर गई ।
ये सिलसिला चलता रहा ,
और जिन्दगी गुजर गई ।

ये भी क्या पीना हुआ,
नशा चढा और उतर गया ।
हम ‘रत्ते शाह आपणे,
नशा चढा, चढता ही गया ।।
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             मूल-मन्त्र ॰॰॰
झूठ निरन्तर झूठ,
धन-अर्जन का है मूल-मन्त्र ।
वैश्या जैसे बिका हुआ है,
आधुनिक प्रचार-तन्त्र !!

Saturday, November 9, 2019

अभिवादन……

                               अभिवादन
प्यारभरा अभिवादन,
सुवासित करता है ,
अपना और अपनों का मन !
आत्मीयता ही तो है,
आत्म-विस्तार , आत्मानुभूति ,
आत्मशुद्धि का अनुपम साधन !
……………………………………
जब कभी बेखुदी में खुदा का नूर नजर आता है ,
तभी गुनाहों की कीचड़ से इनसान उबर पाता है ।
……………………………………………
कलियाँ चटकती हैं ,फूल मुसकुराते हैं ।
खुश्बू और मस्ती की बारात सजाते हैं ।
पर डाली से तोड़ने पर लुटे-पिटे- निरीह,
बेबस कश्मीरी पण्डित नजर आते हैं ।।
………………………………………
 नफरतों के जंगल में अंधेरा बहुत है ।
कोई रोशनी दिखा दे ऐ मेरे खुदा !

Monday, November 4, 2019

सत्ता-पक्ष और विपक्ष…

सत्ता-पक्ष और विपक्ष,
हैं ठग-विद्या में दोनों दक्ष ।
इन दोनों का एक है लक्ष्य,
जन-धन ही है इन का भक्ष्य !!
………………………………
इक नागनाथ ,इक सांपनाथ,संग में चुस्त सपोले ,
पर चूहा-चूजा-चिड़ी-कबूतर सब हैं कितने भोले !
………………………………………………
नेताओं की नीयत खोटी और धन्धे हैं काले ।
रोटी-कुटी-लँगोटी जन की पड़े हुए हैं लाले  !!
……………………………………… ……
नेता घड़ियाली आँसू बहाएं दुखी-जनों को देख कर ।
फिर चूल्हा बुझा देते हैं उनका अपनी रोटी सेंक कर  ।।
………………………………………………
नेताओं के नाटकीय छल जनता को मोहते हैं ।
भोली जनता को ये नेता पटक-पटक धोते हैं ।।

Sunday, November 3, 2019

तरंग

                                       तरंग
  कैसे परिभाषित कर पाऊं , भावों की भाषा को प्रिय ।
यह मूक-बधिर-सी होकर भी, हरदम बतियाती रहती है!
॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰
हसरतों के बीहड़ में अन्धेरा बहुत है ,
या खुदा रोशनी कर राह दिखा दे  ।
चाहे जलें दोजख की आग  में हरदम,
पर मेहर कर हमें तू इनसान बना दे !
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हिन्दू-मुस्लिम-सिख या ईसाई हम नहीं ,
बौद्ध-पारसी-यहूदी, मूर्ख दंगाई हम नहीं ।
मन्दिर-मस्जिद-चर्च-पगोडा ढहने दीजिए ,
हम इनसान हैं , इनसान हमें रहने दीजिए ।
……………………………………………………………