किसान
धरती माता के तपः पूत
कृषक अधनंगे और उदास।
प्रचण्ड अनल भीषण सर्दी
में भी अविचल ये वीतराग ।1
धंसी आंख, अगणित झुर्री,
जीर्ण- शीर्ण तन नंगे पांव।
पीड़ा और अभाव बसे हैं
जहां बसे हैं इनके गांव ।2
अपनी जीवन समिधा को
हैं होम रहे योगी तप रत।
सर्वभूत-हित जो जन हैं,
उनका जीवन क्यों अभिशप्त ।3
साहूकार, नेता, अभिनेता
और धर्म के ठेकेदार ।
रक्त पिपासु अधिकारी सब
लूट रहे कृषक भण्डार । 4
सिंह शावक भूखे रहते हैं
शृगालों की दीवाली ।
दुष्ट भेड़िये खा जाते हैं
निर्धन के हक की थाली । 5
प्रचार- गीत, ढोंगी- भगती
जनतंत्र की झूठी टीका है ।
ये ढोलपोल ये नर पिशाच
इन सब का अंतर रीता है ।6
हे कृषक मूर्तिमान पौरुष तू,
नीन्द त्याग कर भीषण रव ।
गीदड़ लोमड़ और भेड़िए
बन जाएंगे भय से शव । 7
है आज अरक्षित बुझी-बुझी
क्यूं बहुजन की जीवन बाती , !
धू-धू कर क्यों नहीं जल रही
भारतमाता की छाती ।
23 अक्टूबर, 1972
बलबीर
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