Friday, July 2, 2021

 किसान


धरती माता के तपः पूत

कृषक अधनंगे और उदास।

प्रचण्ड अनल भीषण सर्दी

में भी अविचल ये वीतराग ।1 


धंसी आंख, अगणित झुर्री,

जीर्ण- शीर्ण तन नंगे पांव।

पीड़ा और अभाव बसे हैं

जहां बसे हैं इनके गांव ।2 


अपनी जीवन समिधा को

हैं होम रहे योगी तप रत।

सर्वभूत-हित जो जन हैं,

उनका जीवन क्यों अभिशप्त ।3 


साहूकार, नेता, अभिनेता

और धर्म के ठेकेदार ।

रक्त पिपासु अधिकारी सब

लूट रहे कृषक भण्डार । 4 


सिंह शावक भूखे रहते हैं

शृगालों की दीवाली ।

दुष्ट भेड़िये खा जाते हैं

निर्धन के हक की थाली । 5 


प्रचार- गीत, ढोंगी- भगती

जनतंत्र की झूठी टीका है ।

ये ढोलपोल ये नर पिशाच

इन सब का अंतर रीता है ।6 


हे कृषक मूर्तिमान पौरुष तू,

नीन्द त्याग कर भीषण रव ।

गीदड़ लोमड़ और भेड़िए

बन जाएंगे भय से शव । 7 


है आज अरक्षित बुझी-बुझी

क्यूं बहुजन की जीवन बाती , !

धू-धू कर क्यों नहीं जल रही

भारतमाता की छाती ।

23 अक्टूबर, 1972

बलबीर



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