Sunday, November 3, 2019

तरंग

                                       तरंग
  कैसे परिभाषित कर पाऊं , भावों की भाषा को प्रिय ।
यह मूक-बधिर-सी होकर भी, हरदम बतियाती रहती है!
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हसरतों के बीहड़ में अन्धेरा बहुत है ,
या खुदा रोशनी कर राह दिखा दे  ।
चाहे जलें दोजख की आग  में हरदम,
पर मेहर कर हमें तू इनसान बना दे !
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हिन्दू-मुस्लिम-सिख या ईसाई हम नहीं ,
बौद्ध-पारसी-यहूदी, मूर्ख दंगाई हम नहीं ।
मन्दिर-मस्जिद-चर्च-पगोडा ढहने दीजिए ,
हम इनसान हैं , इनसान हमें रहने दीजिए ।
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