चाँद ॰
ऊबड़-खाबड़-निष्प्राण-पथरीला-वीरान,
इस सत्य से अवगत है आजकल इनसान ।
हम यादों में बसे चाँद को भुलाएं कैसे ,
जमीं फ़र चाहत के उस चाँद लाएं कैसे !
***************************
बोतल ॰॰
कल तक थी खाली बोतल,
आज फिर से भर गई ।
ये सिलसिला चलता रहा ,
और जिन्दगी गुजर गई ।
ये भी क्या पीना हुआ,
नशा चढा और उतर गया ।
हम ‘रत्ते शाह आपणे,
नशा चढा, चढता ही गया ।।
********************
मूल-मन्त्र ॰॰॰
झूठ निरन्तर झूठ,
धन-अर्जन का है मूल-मन्त्र ।
वैश्या जैसे बिका हुआ है,
आधुनिक प्रचार-तन्त्र !!
ऊबड़-खाबड़-निष्प्राण-पथरीला-वीरान,
इस सत्य से अवगत है आजकल इनसान ।
हम यादों में बसे चाँद को भुलाएं कैसे ,
जमीं फ़र चाहत के उस चाँद लाएं कैसे !
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बोतल ॰॰
कल तक थी खाली बोतल,
आज फिर से भर गई ।
ये सिलसिला चलता रहा ,
और जिन्दगी गुजर गई ।
ये भी क्या पीना हुआ,
नशा चढा और उतर गया ।
हम ‘रत्ते शाह आपणे,
नशा चढा, चढता ही गया ।।
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मूल-मन्त्र ॰॰॰
झूठ निरन्तर झूठ,
धन-अर्जन का है मूल-मन्त्र ।
वैश्या जैसे बिका हुआ है,
आधुनिक प्रचार-तन्त्र !!
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