Friday, November 15, 2019

कैसे मुक्ति पाऊँ ॰

कैसे मुक्ति पाऊँ ॰

हँसना-रोना भूल चुका हूँ,
दिल की धड़कन किसे सुनाऊँ ।
विस्मृति के अंधकार में,
कहाँ स्वयं को खोजने जाऊँ ।

बेसुरी-सी एक ही धुन है ,
जिसकी निश-दिन अलख़ जगाऊँ ।
जग-दलदल में धंसा हुआ हूँ,
उससे कैसे मुक्ति पाऊँ !
००००००००००००००००००००००००००००

     कैसे जी पाऊँ ॰॰

बहुत क्रोधित हूँ अपने पर ,
जग-आकर्षण भूल न पाऊँ ।
जिस मिट्टी से निर्मित हूँ मैं,
उसे कहाँ अब धोने जाऊँ  !

जग-दलदल में कमल खिले हैं,
बीच इन्हीं के मैं मण्डराऊँ ।
जिस दलदल में पला-बढ़ा हूँ,
उसके बिन कैसे जी पाऊँ। !!



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