Thursday, November 28, 2019

अन्तर्मन


  अंतर्मन
  
अंतर्मन, निर्बन्ध नींद में,
कुरंग कुलांचें भरता है ।
अप्रशिक्षित मुक्त तुरंग-सा ,
वह सर्वत्र विचरता है । 1

नित कल्पना कल्प-तरु की ,
फुंगी पर झूला करता है
पुलकित मन-पाखी गर्वीला,
फुग्गा-सा फूला करता है । 2

है अन्तर्मन के अतल गर्भ में,
आकुल, अकूत भाव-संसार
सपन-लोक में ही खुलते हैं,
अकथ, अजाने अंतर-द्वार। 3

सुसुप्ति के गहन तमस में
अद्भुत सपनों का सृजन ,
पर प्रलयकारी एक किरन ,
हा ! छुई-मुई-सा अंतर्मन ! 4
बलबीर


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