अंतर्मन
अंतर्मन, निर्बन्ध नींद में,
कुरंग कुलांचें भरता है ।
अप्रशिक्षित मुक्त तुरंग-सा ,
वह सर्वत्र विचरता है । 1
नित कल्पना कल्प-तरु की ,
फुंगी पर झूला करता है ।
पुलकित मन-पाखी गर्वीला,
फुग्गा-सा फूला करता है । 2
है अन्तर्मन के अतल गर्भ में,
आकुल, अकूत भाव-संसार ।
सपन-लोक में ही खुलते हैं,
अकथ, अजाने अंतर-द्वार। 3
सुसुप्ति के गहन तमस में ,
अद्भुत सपनों का सृजन ,
पर प्रलयकारी एक किरन ,
हा ! छुई-मुई-सा अंतर्मन ! 4
बलबीर
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